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Dec 14
लॉतिन अमेरी्की लो्क कथा-श्याम सखा ‘श्याम’ 
एक रेड इण्डियन बूढ़ा अपने पोते के साथ बैठा था। बूढ़े को दमे की बीमारी थी। सांस धौकनी की तरह चल रही थी उसकी छाती व पेट बुरी तरह हिल रहे थे। उसके दिल की धड़्कन उसकी दुबली पतली छाती में जोरों से धड़कती दिख रही थी। पोता अबोध बाल· था पूछ बैठा, ”दादा जी! यह आपके दिल में क्या हो रहा है।’
 बूढ़ा लम्बी साँस भरकर बोला, ”बेटा मेरे दिल में दो भेडिय़े हैं जो लड़ते रहते हैं। एक भेडिय़ा गुस्सैल और क्रोधी है तथा दूसरा प्यारा दिलकश व शान्त प्रकृति का है। 
 पोते ने फिर पूछा, ”इन में कौन जीतता है? 
 ”दादा ने कहा,  ”बेटे! वही जिसको मैं भोजन देता हूँ।
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Jul 24

”इतनी सुबह-सुबह क्या खटर-पटर लगा दी मम्मी सोने भी नहीं देती बेटी ने भन्नाते हुए उन्निदी आवाज मे कहा।
कल रात गुड्डु बेटे का फोन आया था। उसकी आवाज कुछ ढीली-ढीली थी। शायद हॉस्टल में दिल नहीं लग रहा। इसलिए बीमार होते हुए भी तेरे पापा इलाहाबाद गए हैं। बिना रिजर्वेशन कैसे कष्ट उठाते पहुँचेगे। उनके लिये परांठे  सेके थे,अब दरवाजा बन्द किया है। माता-पिता ही करते है सब कुछ। एक तुम हो नींद खुलने से ही नाराज हो गई। सचमुच आजकल के बच्चे ? मां नाराज स्वर में कह उठी।
अरे नाराज  क्यों होती हो मम्मी तुम अपने बच्चों के लिए कर रही हो। हमारी बारी आने पर हम अपने बच्चों के लिए कर देंगे। अब सोने दो सुबह-सुबह यह खटराग बन्द करो । कहकर समिधा ने कम्बल मुँह पर खींच लिया। श्यामसखा ‘श्याम’

Jul 06

बंधुआ कौन ?

बीबी जी अगले हफ्ते हमार पर्व है।कल से चार दिन की छुट्टी है मेरी बीबी जी!
चार - चार दिन छुट्टी ! अरे ऐसे ·कैसे काम चलेगा भला! एकआध दिन तो ठीक है चार दिन?
-
बीबी जी हमार पर्व है! छट पर्व! छुट्टी रहेगा हम सब फ्लैट वालन को पहले हीकह दिये हैं।
-
अरे तू छुट्टी भी ले ले! पर दो दिन की ले ले! दो दिन का ओवर टाइम ले लेना पर आ जाना हाँ!
अरे नहीं बीबी जी छट्टï पर्व मां कोनो काम हम ना करे! कितना ही पैसा कोई दे।पार- साल ऊ महताइन अ्कड़ी थी। सो हम अपना पगार छोड़के, उसका घर छोड़ दिया था हाँ।
शिवदुलारी कहकर ठसकती चलदी। मिसिज रस्तोगी मुँह बाए खड़ी रह गई थी।
साँझ ढले वे अपने पति को यह घटना बतला रही थी कि फोन आ गया । फोन उठा्कर वे बोली।
हलो!
कौन बेटा मनु!
हाँ- हाँ सब ठी· है तू दीवाली पर आ रहा है ना!
नहीं ! क्यों नहीं?
दिवाली पर प्रोजेक्ट! तू ना कर दे एक ही तो त्यौहार आता है साल भर में। और एकदिन का पच्चीस हजार दे रहे है तो क्या हुआ? लक्ष्मीपूजन घर पर ही करना। आ जाना
मम्मी मुश्किल ्कम्पनी छुट्टी कर देगी ेकहकर मनु ने फोन रख दिया।
मिसिज रस्तोगी हाथ में फोन लिए दिन में दूसरी बार मुँह बाए खड़ी थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि बंधुआ गरीब शिवदुलारी है या उनका पचास हजार महीना वेतन वाला बेटा।

श्यामसखा ‘श्याम

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Jun 14

आज फिर विक्रम आफिस में ही था। सुधा चार बार फोन कर चुकी थी। हर बार वि्क्रम की स्टेनों फोन उठाती कहती ‘यस हूम डू यू वान्ट’’ घन्टियों सी खनखनाती बड़ी दिलकश आवाज थी स्टेनो की। सुधा परेशान थी, इधर सप्ताह में दो तीन बार ऐसा होने लगा था। जब से यह नई स्टैनो स्टेला तबादला होकर आई है विक्रम को आफिस से लौटने में देर होने लगी है। फिर उसने सुन रखा था  कि ईसाई लड़कियाँ बड़ी खुले दिमाग वाली व दिल फेंक होती है अत: वह घबरा रही थी।

      आज सुधा सब कुछ पता करके रहेगी। सुधा ने गाड़ी निकाली और सीधे वि्क्रम के आफिस जा पहुंची। बाहर चपड़ासी बैठ ऊंघ रहा था उसने कहा अन्दर साहिब स्टैनो को डिक्टेशन दे रहे हैं। मगर सुधा अन्दर चली गई।

      यस हू आर यू? एण्ड वट डू यू वान्ट? उसी मोहक आवाज की स्वामिनी सुधा से पूछ रही थी। सुधा भोंचक थी आवाज की मालकिन थुलथुल अधेड़ महिला थी।

      ‘‘व्हेयर इज मि0 विक्रम’’्मि.विक्रम कहाँ है ? सुधा ने मुश्किल से पूछा।

      ‘ही इज इन बाथरूम। सुधा वहां से ऐसे भागी जैसे उसके पीछे पागल कुत्ता पड़ा हो।

 

                  श्यामसखा‘श्याम

 

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Jun 14

मास्टर हरेराम जी को अपने बेटे के लिए वधू की तलाश थी। सेल्स टैक्स इन्सपैक्टर चयनित राजेश के अनेक रिश्ते आए थे। आखिरकार दो लड़कियों पर आकर पसंद अटक गई। दोनों ही सुन्दर पढ़ी लिखी लड़कियां थी। माँ को सुरेखा पसंद थी और पिता को मानसी। यूँ माँ को मानसी में कोई कमी नजर नहीं आ रही थी,  मगर उसका तर्क था मानसी अपने माता पिता की अकेली सन्तान है जबकि सुरेखा के एक भाई और बहन भी है आखिर राजेश को साले साली का सुख भी तो मिलना चाहिए। पति पत्नी फैसला नहीं कर पाए तो उन्होंने फैसला राजेश पर छोड़ दिया।

                राजेश ने सारी बाते सुनकर कहा ‘‘साले साली को क्या चाटूंगा, मानसी के पिता की सारी जायदाद तो मेरी होगी।’’ बेटे की समझदारी पर मास्टर हरेराम की मूंछे मुस्करा उठी।

श्यामसखा‘श्याम

 

May 16

देखकर हालत बुतों की:हर देश की सरकार जन-हिताय,जन-सुखाय नीतियाँ,योजनाएँ बनाकर उन्हे लागू करके जनता की स्थिति सुधारने का दावा ही नहीं करती बल्कि अपने किये-अनकिये क्रियाकलापों का गुणगान करने के लिये अखबारों मे पूरे सफ़े के विग्यापन जारी करती है.और अपने नेताओं की याद में या वोट बैंक को राजी करने के लिये चौराहों ,पार्कों मे नेताओ के मुस्कराते दमकते चेहरों भाव -भंगिमाओं वाले बुत लगा देते हैं,कहने को ये बुत आम जनता,युवा पीढी हेतु प्रेरणा के श्रोत हैं ,पर क्या वास्तव में ऐसा है ?
    एक दिन टहलते हुए पार्क में लगी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बुत के पास पड़ी बैंच पर जा बैठा.पास ही एक दम्पति घास में बैठा था उनका ७-८ साल का बेटा धमाचौकड़ी मे मशगूल था,बच्चा बुत के पास आकर पत्थर पर खुदे नेताजी के विश्व प्रसिद्ध बोल अटक-अटक कर पढ़्ने लगा —-तु..म..मु..मुझे ..खू..खून..दो.खून दो फिर वह चिल्ला उठा.खू.अ अ न ,खून
 खून-खून की चिल्लाहट सुन मां बाप चौंककर पास आ गये; पूछने लगे क्या हुआ ? कहां है खून ?
 बच्चे ने नेताजी के बुत के नीचे इशारा करते हुए कहा ‘वो ! देखो’.लिखा खून देखकर उनकी जान में जान आई । वे हँसने लगे ,पिता बोला ‘बेटा इसमें डरने की क्या बात है ?’
 बेटा रुआंसा होकर कहने लगा ‘हेल्प द पूअर फेलो ,ही इज इल ,ही नीडस ब्लड .पापा यह आदमी खून मांग रहा है । यह बीमार है,आप टी.वी वालों को बुलायें । वे उस दिन उस गरीब लड़्की के लिये ओ निगेटिव खून की अपील कर रहे थे; उसे खून मिल गया था, इसे भी मिल जायेगा प्लीज पापा टीवी वालों को फोन करें । बच्चा उत्तेजित था.उसका पिता उसे गोद में लेकर उस महान उक्ति का अर्थ समझाने की नाकाम कोशिश कर रहा था । बच्चे की बात ने मेरे मन को उद्वेलित कर दिया और मैं अपने नगर के और बुतों का हाल जानने के लिये निकज पड़ा, तो पाया कि नगर के बुतों की हालत वाकई खराब़ थी ।
  गांधी जी की सफेद संगमरमर की प्रतिमा धूल से अटी पड़ी थी । उसपर बैठा कबूतर-कबूतरी का किलोल करता जोड़ा शायद उनके ब्रह्मचर्य के सिद्धान्त की धज्जियां उखाड़्ने की फ़िराक में था ।
 आगे चलकर  पाया कि बाबा साहेब की एक उंगली पर एक कव्वा बैठा था तथा दूसरे हाथ में पकड़े संविधान पर दूसरा कव्वा काबिज था तथा अपनी काक-द्रिष्टि से संदेहात्मक ताक-झांक कर रहा था । चंद्रशेखर आज़ाद के पिस्तोल पर बैठी एकाकी फ़ाख्ता संभवत: अमन का संदेश देने के मूड मे थी मगर श्रोताओं के अभाव मे मौन धारण किये थी ।
 सरदार भगत सिहं के बुत के नीचे बैठे दो मज़दूर बीड़ी का धुंआ उगल रहे थे.वे शायद किसी जीवित सिक्ख के सामने ये हरकत न कर पातेक । एक और नजारा इस तरह  था कारगिल में शहीद हुए दो जवानो के पिद्दी से बुतों के बीच एक स्थानीय नेता की विशाल रौबीली प्रतिमा विराजमान थी.वहीं दीवार पर किसी सुधि दर्शक ने लिख दिया था –
              जो था कभी सिंह आज मिरगछौना हुआ
              नेताजी के बुत के आगे शहीद बौना हुआ
 
आगे चला तो अनहोनी की आशंका से दिल दहल उठा एक जातीय नेता के बुत पर कई बच्चे चढ़े हुए थे । मुझे लगा कि उनके खेल खेल में कहीं नेताजी की बाँह या नाक टूट गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे .क्योंकि ऐसा होते ही छुटभैये नेता जो ऐसे अवसरों की ताक में ही रहते हैं उन्हे राजनीति व अखबारों की सुर्खियों मे आने का मौका मिल जाएगा । वे धरना ,जाम पर उतर आएंगे और पुलिस को लाठी भांजने की सुविधा मिल  जायेगी । विरोधी पार्टियों को भी तो मुद्दा मिल जाएगा सरकार को कोसने का और इस सब को भुगतेगी जनता । यह सब सोचकर मैने ब्च्चों को हड़्काया तो वे वहां से भाग निकले । मुझे एक सार्थक काम करने का सुखद अहसास हुआ.यही नहीं एक चौराहे पर तो कैलाशवासी भगवान शिव को भगतों ने लोहे के कारागार में बंदी बनाकर बैठा रखा था- कारण चढ़ावे की सुरक्षा करना था. मेरे जहन में एक सवाल तब से बैठा है कि क्या हम अपने नेताओं के बुत चौराहे पर लगा कर क्या सचमुच नवपीढ़ी को कोई प्रेरणा दे पा रहें हैं या बैठे बिठाये इन राजनैतिक छुट- भैयों को दंगे फैलाने की,सामाजिक समस्यायें पैदा करने के हथियार सौंप रहे हैं,अगर आंकड़े एकत्रित कियें जायें तो पता लगेगा कि बुतों की तोड़-फोड़ से उत्पन्न जातीय व साम्प्रदायिक झगड़ों से कानून व्यवस्था बिगड़्ने एवं  उसे काबू करने में न केवल देश की करोड़ों की सम्पति का नुकसान होता है अपितु कितने बेकसूर लोगों की जान जाती है ।
      मेरी अल्प समझ के अनुसार अगर बुत लगाने आवश्यक ही हैं तो राज्यस्तर पर एक म्यूजियम बना दिया जाये,जहां जो भी संस्था या पार्टी बुत लगाना चाहे अनुमति लेकर त्तथा एक सुनिश्चित एकमुश्त न्यास राशि करवाकर बुत लगाले तथा नेताजी के निर्वांण -जन्म दिवस पर म्यूजिम के प्रांगण में उत्सव मना ले । भगवानों- महात्माओं की प्रतिमाएं केवल मंदिरों या सभागारों में ही लगाईं जायें । इसका सुन्दर उदाहरण चंडीगढ़ या कोटा शहर है जहां के चौराहे फ़ूलों से लदे हुए आँखो व मन को मोह लेते हैं ।
 आज बुतों के हालात देखकर तो ये पंक्तिया मन मे उभरतीं हैं—
      
           देखकर हालत बुतों की हैं लगाते
           टूटने को आइनो से होड़ पत्थर

श्यामसखा ‘श्याम’१२ विकास रोहतक १२४०01 

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